भारत के प्रत्येक व्यक्ति को ज्ञात है कि पश्चिम बंगाल में चुनाव से ठीक पहले SIR के नाम पर लगभग 91 लाख वोट काटे गए थे। यह वोट कई राज्यों के कुल वोटर्स से भी अत्यधिक है जैसे कि लोकसभा चुनाव 2024 में उत्तराखंड के कुल वोटर्स 84 लाख थे।
ज़ाहिर है कि बंगाल प्रदेश की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी सबकुछ जानती थी और देश भी जानता है कि इतनी बड़ी संख्या में ना तो घुसपैठी हो सकते हैं और ना कोई त्रुटि हो सकती है। यह सरेआम भाजपा को लाने का खेल चल रहा है जिसका संज्ञान आवश्यक था।
इस प्रक्रिया के विरोध के लिए सबसे बेहतरीन तरीका था तमाम विपक्षी पार्टियों द्वारा चुनाव प्रक्रिया में हिस्सा ही ना लेना। क्योंकि इतनी बड़ी तादाद में स्वयं ही षड्यंत्र की बू आ रही है। फिर भी तमाम पार्टियां इस प्रक्रिया का हिस्सा हुई और अब विरोध कर रहे हैं।
हालांकि चुनाव आयोग ने कहा कि 63 लाख वोटर्स मृत या गैर हाज़िर हैं जबकि 27 लाख लगभग तार्किक विसंगतियों की वजह से काटे गए जो वापस जुड़ जायेंगे मगर परिणाम यह है कि 34 लाख ने अपील दायर की फिर भी केवल 1,607 नाम जुड़ सके।
अब सवाल यह है कि यदि 27 लाख नाम त्रुटियों के कारण भी कटे तो वह त्रुटियां ठीक क्यों नहीं हुई? क्या इतनी बड़ी संख्या मृत, त्रुटि, गैरहाजिर जैसे शब्दों को डालकर संभव माना जा सकता है? जबकि महज दो वर्ष पहले तो लोकसभा चुनाव हुआ था?
इसीलिए भाजपा का षड्यंत्र कोई संदिग्ध नहीं बल्कि जगजाहिर अथवा खुलेआम डकैती है लेकिन विपक्षियों की भूमिका अब संदिग्ध है कि आखिर ऐसी क्या वजह है जो चुनावी धांधली, इवीएम से लेकर SIR तक को जानने के बाद भी इस प्रक्रिया का हिस्सा बने?
विरोध हमेशा चुनाव निबटने के बाद ही क्यों, फिर पांच साल शांति? आने वाले चुनावों में समय रहते इस प्रक्रिया का बहिष्कार करें जबतक कि पारदर्शिता का दायरा ना बढ़े अन्यथा एक दिन चीन, कोरिया, अफगानिस्तान, रूस की भांति एकल पार्टी व्यवस्था आने जा रही है।